कसमें-वादे किए थे तुमने
साथ जीने और मरने की
इच्छा-आकांक्षाऍं अनंत थीं
हम दोनों की जीवन की
निर्बाध, निरंतर सुखी जिंदगी
पंख लगे थे सपनों के
जाने किसकी नजर लग गई
सब कुछ मेरी लुटा ले गई
जीवन-संगिनी बीच भंवर में
मुझे छोड़कर विदा हो गई।
लेटी थी गंगा के तट पर
स्मित हास थी चेहरे पर
पूर्व नियोजित लंबी यात्रा
बैकुण्ठ चतुर्दशी का अवसर
बिना तनाव के मनोहारी छवि
चांदनी खिली मुखमंडल पर
लगता था अभी सोई है
कहती थी मुझे सोने दें
अब मैं साथ न दे सकूंगी
चिरनिद्रा में खोने दें।
आई थी लक्ष्मी मेरे घर
लक्ष्मी मेरी चली गई
जीवन के जटिल मोड़ पर
अनायास वह छोड़ गई
किंचित भी दया नहीं आई
वादे से अपने मुकर गई
किस गलती की मिली सजा
जाने-अनजाने क्या पाप हुआ
जीवन के अंतिम पड़ाव पर
किस अपराध का दण्ड मिला ?
जीवन दुर्गम लगता है अब
किसके सहारे जीऊंगा
अनगिन सितारों की झिलमिल में
तुम्हें कहॉं मैं खोजूंगा ?
जीवन मेरा शिथिल-यंत्रवत
अकिंचन, किंकर्त्तव्यविमूढ़
तुम बन गई परलोक निवासी
विनती-अरजी है मेरी
जल्दी पास बुला लो मुझको
नहीं लगाओ अब देरी ।।