Friday, January 29, 2021

संस्कार: जीवन सार

चित्तवृत्ति का है संपोषक

'शुद्धिकरण' का है पर्याय

सद्विचार, आचार नियामक

जीवन की नींव हैं संस्कार

वेद, स्मृति, पुराण आधारित

शुद्ध करे अंत: करण,मन- मस्तिष्क

गर्भाधान से अन्त्येष्टि पर्यन्त

सभ्यता - संस्कृति का है प्रतीक।

शांति - समृद्धि का मार्ग प्रशस्त

ईर्ष्या - द्वेष का करे परित्याग

संस्कार आलोकित दीपशिखा

शांत हृदय, सुंदर व्यवहार

मिलती है जीवन में शक्ति

आभूषण  है सोलह संस्कार

अभीष्ट गुणों का करे विकास

जीवन का मधुर संगीत संस्कार।

क्रय - विक्रय की वस्तु नहीं

उपार्जित - अर्जित है संस्कार

जीने की अनुपम पद्धति है

सफल जीवन का मूलाधार

संस्कार विहीन शून्य है जीवन

शिक्षा से समृद्ध संस्कार

जीवन सोपान अलंकृत, झंकृत

संस्कार है जीवन का सार।

अच्छी परवरिश,अच्छा संस्कार

शिक्षा - समाज से सहज प्राप्त

संस्कार मानवता की पहचान

बिन संस्कार जीवन वीरान

संस्कार - मर्यादा विहीन

मानव सचमुच है दीन हीन

जीवन - पथ का अमूल्य पाथेय

संस्कार सफल जीवन का ध्येय।।

Monday, January 4, 2021

यथार्थ

 

कोई कहे मिले सद्गति

कोई करे शत-शत नमन

कोई कहे रेस्ट इन पीस

शोक-संवेदना का अनवरत क्रम

वह क्या कहे,क्या करे

उजड़ गया जिसका चमन

जिस पर बीते,वही तो जाने

दुःस्सह पीड़ा करे सहन।

बड़े जतन से बाग लगाया

पुष्पित हुआ आँचल-दामन

सुखद भविष्य का सपना सँजोए

आनंदित था हर पल हर क्षण

कहाँ कौन-सी चूक हुई पर

बिखर गया सुंदर घर-आँगन

झटके भर में ध्वस्त हो गया

अश्रूपूरित युगल नयन।

लेशमात्र भी नहीं थी शंका

खिला-खिला था हर्षित मन

विनाशकारी आंधी बन आई

सुख-शांति पर लगा ग्रहण

जिस मालिन के स्वेद बिंदु से

वर्धमान था वन-उपवन

काल ग्रास में समा गई

छोड़ गई पुरजन-परिजन। 

मित्र बंधु कुटुंब सभी का

शोक सांत्वना का चलता क्रम

आशा है अब भी लौटेगी

मृगतृष्णा है या मतिभ्रम

होनी तो होकर रहती है

कर ले कितने यत्न-जतन

जन्म-मृत्यु तो अटल सत्य है

सृष्टि का शाश्वत सरल नियम।। 

Friday, January 1, 2021

राह ढूँढ़ रहा

छल-प्रपंच भरी दुनिया में 

मैं सच्‍चा इंसान ढूँढ़ रहा 

स्‍वार्थ सिद्धि के बीच भंवर में 

अपने-पन की नाव ढूँढ़ रहा 

कौन-अपना और कौन पराया 

परख रहा हूँ कठिन मार्ग में 

दुख की अंधेरी रात घनेरी 

आशा का प्रभात ढूँढ़ रहा। 

सुख में साथ मिला बहुतेरे 

दुख में संगी-साथ ढूँढ़ रहा 

मातम पर बैंड बजाने वालों 

तेरे लिए सन्‍मार्ग ढूँढ़ रहा 

कोई अपना ग़र खो जाए तो 

जीवन का अंदाज ढूँढ़ रहा 

मनुज अच्‍छा मिला नहीं कोई 

देवदूत की राह ढूँढ़ रहा । 

जीवन में उम्‍मीद छोड़ चुका 

सुखद स्‍मृतियों को ढूँढ रहा 

वक्‍त बहुत बेदर्दी निकला 

रिश्‍तों में मिठास ढूँढ़ रहा 

वेदना कोई बॉंट न पाता 

परछाई नहीं साथ दे सका 

राह कठिन, पग-पग है बाधक 

यात्रा का मकसद ढूँढ़ रहा। 

इस जीवन की याद नहीं है

पूर्व जन्‍म का पाप ढूँढ़ रहा 

अबतक जिसने साथ दिया 

पग-पग पर अहसास ढूँढ़ रहा 

मृग तृष्‍णा है, जान रहा हूँ 

फिर भी उसकी राह ढूँढ़ रहा 

अभिशप्‍त लगता है जीवन 

शीध्र मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ रहा ।।