छल-प्रपंच भरी दुनिया में
मैं सच्चा इंसान ढूँढ़ रहा
स्वार्थ सिद्धि के बीच भंवर में
अपने-पन की नाव ढूँढ़ रहा
कौन-अपना और कौन पराया
परख रहा हूँ कठिन मार्ग में
दुख की अंधेरी रात घनेरी
आशा का प्रभात ढूँढ़ रहा।
सुख में साथ मिला बहुतेरे
दुख में संगी-साथ ढूँढ़ रहा
मातम पर बैंड बजाने वालों
तेरे लिए सन्मार्ग ढूँढ़ रहा
कोई अपना ग़र खो जाए तो
जीवन का अंदाज ढूँढ़ रहा
मनुज अच्छा मिला नहीं कोई
देवदूत की राह ढूँढ़ रहा ।
जीवन में उम्मीद छोड़ चुका
सुखद स्मृतियों को ढूँढ रहा
वक्त बहुत बेदर्दी निकला
रिश्तों में मिठास ढूँढ़ रहा
वेदना कोई बॉंट न पाता
परछाई नहीं साथ दे सका
राह कठिन, पग-पग है बाधक
यात्रा का मकसद ढूँढ़ रहा।
इस जीवन की याद नहीं है
पूर्व जन्म का पाप ढूँढ़ रहा
अबतक जिसने साथ दिया
पग-पग पर अहसास ढूँढ़ रहा
मृग तृष्णा है, जान रहा हूँ
फिर भी उसकी राह ढूँढ़ रहा
अभिशप्त लगता है जीवन
शीध्र मुक्ति का मार्ग ढूँढ़ रहा ।।
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