स्लम के बच्चे, शहर के बच्चे,
बातों-बातों में वे खोले,
अपने मन के कच्चे चिट्ठे।।
हम उठते हैं सुबह-सबेरे,
करते घर की साफ-सफाई,
हम से ही तो चलता है,
घर का खर्चा, हे मेरे भाई!
भारी-भरकम बस्ता ढ़ोते,
मम्मी-पापा करे चढ़ाई,
अब बस आई, तब बस आई।।
हम तो देखें माल-मवेशी,
करनी पड़ती गोबर-करसी,
मन तो करता करें पढ़ाई,
हम भी बाँधें काॅलर-टाई।
‘सर्व शिक्षा अभियान’ की अच्छाई,
स्लम के बच्चे, शहर के बच्चे,
हम सब तो है भाई-भाई,
आओ! मिलकर करें पढ़ाई।।

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