विपदा की संगिनी है बाढ़ की विभीषिका
बेवस, असहाय लोग छिनती आजीविका
बाढ़ की धार में विलीन होती बस्तियाँ
लोग-बाग बाँध पर छिन जाती खुशियाँ
नष्ट होती फसलें, बहते मवेशी
दुबक जाते वृक्षों पर विषधर संग पंछी।
जल समाधिस्थ होते सैलाब में अनेक लोग
मर्माहत हो सहते हैं स्वजनों का वियोग
इन्द्रदेव भी अपनी दिखलाते बानगी
अहर्निश वर्षा से बढ़ाते हैं त्रासदी
आशा की किरण बनती स्वयंसेवी संस्थाएँ
सरकारी राहत ही पीड़ितों की आशाएँ।
जीवंत जिजीविषा से भरा जन-मानस
विपत्तिग्रस्त होकर भी परस्पर सहायक
प्राकृतिक विपदा को झेलते धैयपूर्वक
चुनौती को अवसर में बदलने को तत्पर
बाढ़ की विभीषिका है सुरसा दुखदायिनी
सहनशक्ति, धैर्य ही विपत्ति में संगिनी।
प्राकृतिक विपदा है असीम दुखदायक
मानव-प्रवृत्ति भी विप्लव के हैं कारक
पर्यावरण संरक्षण ही दिला सकेगा त्राण
मृदा, वारि, वन-संरक्षण से संभव है कल्याण
जल-जीवन-हरियाली से ही आ सकती है क्रांति
पर्यावरण की रक्षा से ही जन-जीवन में शांति।।

बहुत बढ़िया👌🏻
ReplyDeleteसुंदर एवम सारगर्भित रचना सर
ReplyDelete