ग्रामीण अस्मिता के संवाहक
भारत की आत्मा खेतों में
गाँव की इनसे पहचान
खाद्य उत्पादन के उत्प्रेरक
खेत, खलिहान और किसान ।
सीधी, टेढ़ी-मेढ़ी आर
खेतों के गले की हार
कहीं हल तो कहीं ट्रैक्टर
बीनें कहीं ख़र-पतवार
रोपनी-कटनी दृश्य मनोरम
पकी फ़सल खलिहान गुलज़ार ।
सुबह-शाम खेत ही जीवन
खेत बिना जीवन वीरान
माथे पगड़ी और मुरैठा
हाथ में लाठी है पहचान
अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ कृषक हैं
कर्म क्षेत्र खेत खलिहान ।
खेतों से आती ख़ुशहाली
कृषकों में ऊर्जा संचार
हरे-भरे खेत लगे सुहावन
प्राकृतिक शोभा के भंडार
असली भारत बसे गाँव में
खेत खलिहान जीवन आधार ।
कृषि प्रधान देश भारत में
अर्थ व्यवस्था के आयाम
शस्य-श्यामला हरित-भरित
लोगों के बसते मन-प्राण
औद्योगीकरण के युग में
संरक्षित हों खेत खलिहान ।।





