योगेश्वर कृष्ण की वाणी
ज्ञान, कर्म और भक्ति का योग
भाग महाभारत के
भीष्म पर्व का
व्यावहारिक
मार्ग का उपदेश
उपनिषदों का सार
है गीता
सर्वमान्य है
ग्रंथ पवित्र
कृष्ण-अर्जुन
संवाद के रूप में
वाचनामृत, है मानवमित्र ।
अठारह अध्यायों में है वर्णित
समाहित हैं सात सौ श्लोक
जीवन प्रबंधन, दार्शनिक दृष्टिकोण
निष्काम कर्म पर सम्यक् ज़ोर
धर्म-कर्म, यम-नियम की चर्चा
सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकास
उपासना-प्रार्थना, मोक्ष, युद्ध
राजनीति, मैत्री, आचार-विचार ।
भगवान कृष्ण ने विवस्वान
को
विवस्वान ने मनु
को बतलाया
मनु ने
इक्ष्वाकु को बतलाकर
जीवन का मर्म-रहस्य
समझाया
अनिश्चय, हताशा की स्थिति में
गीता सचमुच है
पथदर्शक
जटिल समस्यायों
से अविचलित
मानव रह सकता स्थितप्रज्ञ ।
प्रथम अध्याय में है वर्णित
अर्जुन के हृदय का क्लेश-विषाद
द्वितीय और तृतीय अध्याय में
सांख्य योग, कर्मयोग सविस्तार
ज्ञान, कर्म, सन्यास योग का
विश्लेषण चतुर्थ-पंचम अध्याय
आत्मसंयम, ज्ञान-विज्ञान योग से
परिपूरित षष्ठ-सप्तम अध्याय ।
अष्टम में अक्षर
ब्रह्मयोग का वर्णन
नवम राज
विद्याराज गुह्ययोग
दसम-एकादशम में
पाते हैं
विभूति विश्वरूप
दर्शन योग
द्वादश में भक्ति
योग है वर्णित
त्रयोदश क्षेत्र
क्षेत्रज्ञ विचार
गुणत्रय विचार
योग चतुर्दश में
पंचदश का पुरुषोत्तम योग आधार।
षोडश-सप्तदस अध्याय में क्रमशः
देवासुर संपति श्रद्धात्रय विभाग
गीता-सार अंतिम अध्याय में
मोक्ष संन्यास योग है अभिप्राय
श्रीमद्भगवद्गीता का पठन-अनुशरण
अंत: करण करता है शुद्ध
जीवन की चिंता, मोहमाया से
मानव को मिलती है मुक्ति ।
ज्ञानरूपी
प्रकाश है सचमुच
कर्तव्यज्ञान का
अनुपम श्रोत
जीवन के
मार्गदर्शी सिद्धान्तों से
समस्तग्रंथ है
ओतप्रोत
गीता नहीं है ग्रंथमात्र
यह तो है जीवन रेखा
मानव तो निमित्त-मात्र
है
कर्म करें, नहीं फल की चिंता।।

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