घर-आँगन की रौनक है
करता हरदम सैर-सपाटा
नंद के लाल सदृश लीला
कभी ज्वार और कभी भाटा
सबका प्यारा,राज-दुलारा
आकर्ष अद्भुत और निराला ।
भय नहीं डांट-डपट का किंचित
आन-बान का नहीं पता
हरपल-हर क्षण चंचल-सा मन
मधुर हास मन आनंद दाता
हर्षित-पुलकित पुरजन-परिजन
आकर्ष की अनुपम बाल अदा ।
निर्मल-निश्छल है मुखमण्डल
काले बाल सम काली घटा
धमा-चौकड़ी इधर-उधर
अस्तव्यस्त घर रहे सदा
माँ के आँचल मे छुप जाए
हमने तो कुछ नहीं किया ।
बाल अदा से वारी-न्यारी
माँ-दादी का दुख दर्द मिटा
तनाव भंजक आकर्ष-आकर्षक
नाना बिसरे व्याधि-व्यथा
आनंदित हैं दादा शशि-सम
निरखि बाल कृष्ण लीला ।
आकांक्षा-तुषार के जिगर का टुकड़ा
आकर्ष पर बरसे आशीष सदा
आशीर्वाद का है आकांक्षी
सब दें इसे आशीष–दुआ
सबके आँगन गूँजे किलकारी
ईश्वर की सबपर सदा कृपा ।।
The Rhythm of your Lines and Spaces is great 🤌❤️ #AwesomeNanu
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteBahut sundar
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