अपने कष्ट की कर लें बात
अपनत्व का अलापते जो राग
कष्ट में झटक देते हैं हाथ
पल में बदल जाता परिवेश
दिल में पहुँचाते हैं ठेस
बदल जाती है उनकी राह
अलग हो जाता है संसार।
वक़्त जब नहीं देता है साथ
तब आता कष्ट अपार
हृदय पर पड़ता है आघात
टूटता दुःख का बज्र पहाड़
अपने बन जाते बेग़ाने
चेहरे बन जाते अनजाने
बदलते पल-पल अपना रंग
गिरगिट को भी आती शर्म।
नियति करती है जब चोट
अवसादित्त मन में झंझावत
धैर्य धारण ही एक उपाय
कर्म-संयम ही मात्र पर्याय
सब्र का मीठा होता फल
दुःख रहता नहीं हर वक़्त।
कुछ अब भी अच्छे लोग
कष्ट में करते जो सहयोग
छोड़कर अपना काम तमाम
आते हैं औरों के काम
नियति का चलता रहता चक्र
जीवन निश्चित एक संघर्ष
हर शाम का नया विहान
जीवन है जीने का नाम।।





