Saturday, September 4, 2021

परख

परखनी हो जब भी औक़ात 
अपने कष्ट की कर लें बात
अपनत्व का अलापते जो राग 
कष्ट में झटक देते हैं हाथ
पल में बदल जाता परिवेश 
दिल में पहुँचाते हैं ठेस 
बदल जाती है उनकी राह
अलग हो जाता है संसार।
                        वक़्त जब नहीं देता है साथ
                        तब आता कष्ट अपार
                        हृदय पर पड़ता है आघात
                        टूटता दुःख का बज्र पहाड़
                       अपने बन जाते बेग़ाने
                       चेहरे बन जाते अनजाने
                       बदलते पल-पल अपना रंग
                       गिरगिट को भी आती शर्म।
नियति करती है जब चोट 
अनचाही घटना घटती रोज़
टूट जाते हैं दिल के तार
अवसादित्त मन में झंझावत
धैर्य धारण ही एक उपाय 
कर्म-संयम ही मात्र पर्याय 
सब्र का मीठा होता फल 
दुःख रहता नहीं हर वक़्त।
                          कुछ अब भी अच्छे लोग
                          कष्ट में करते जो सहयोग
                          छोड़कर अपना काम तमाम
                         आते हैं औरों के काम
                          नियति का चलता रहता चक्र
                          जीवन निश्चित एक संघर्ष
                          हर शाम का नया विहान
                         जीवन है जीने का नाम।।

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