सुंदरतम थे बचपन के दिन
न राग-द्वेष, न रंज-तंज
बाल-सखा संग दिनभर खेल
क्षण में लड़ाई, क्षण में मेल
बचपन का जीवन, सुरभित चंदन
मित्र-शत्रु सबका आलिंगन
निश्छल-निर्मल होता बचपन
सार्वभौम संदेश चिरंतन
बचपन में होती दिव्य दृष्टि
स्वर्णिम बचपन की मधुर स्मृति।
यादों के झरोखे बचपन के
मानस-पटल पर है जीवंत
न कोई चिंता, न बंधन
चटाई पर ही पठन-पाठन
स्याही-दावात, करची की कलम
गुरू की डाँट, कड़ा शासन
बस्ते का बोझ था न्यूनतम
जीवन-चर्या के नियत नियम
गुरू आदर और अनुशासन ही
सफल शिष्य का मानदण्ड।
ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है
चिंतित व्यथित होता तन-मन
बाल्यावस्था छोड़ के पीछे
मनुज पाता है यौवन
चपलता-चंचलता बचपन की
लोग जाते सबकुछ भूल
जीवन की जटिल समस्याओं में
सब हो जाते हैं मशगूल
बचपन का उत्सुक निर्मल मन
लील जाता है यौवन
सृष्टि का शाश्वत नियम है
लौटता नहीं खोया बचपन
स्मृतियाँ रह जाती शेष
बदली स्थिति, बदला परिवेश
झुक-झुक खोजें खोया बचपन
वृद्धजनों का चंचल मन
आदर-स्नेह देकर हरदम
बालपन को रखें जीवंत
स्वर्णिम बचपन की स्मृति को
वृद्धजनों में खोजें हम।।

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