प्रकृति का पुलकित अंग-अंग
कण-कण में उल्लास-उमंग
भौंरे का मधुमय स्वर गुंजन
पंचम सुर में कोयल गायन
पृथ्वी परिपूरित पीत बसन
वैविध्य और विस्तार संग
"ऋतुनां कुसुमाकर" है बसंत।
माघ शुक्ल पंचमी शुभ दिनबागेश्वरी की पूजा में लीनपुष्पित पल्लवित सुरभित बागढोल मजीरे पर गाते फागपीले सरसों-सा खिला बदनहर्षित आनंदित मानव मनईश्वर की अनुपम कृति बसंत।
ईश्वर की सृष्टि जीवन का राग
ऋतु मात्र नहीं,है मनोभाव
मंगल प्रतीक स्वर्णिम प्रभात
विरह मिलन का संधि काल
आलोकित करता दिग् दिगंत
देशभक्त वीर जवानों का
बसंती चोला है बसंत।
सूखी नदियां कटते जंगल
पक्षी के उजड़ते आश्रय स्थल
मानव लिप्सा का है प्रतिफल
पर्यावरण संरक्षण ही विकल्प
जल-जंगल रक्षा का संकल्प
पृथ्वी रक्षा अपनी रक्षा
ऋतु बसंत की शाश्र्वत शिक्षा।
कोयल-सी कुक भौंरे-सा गान
अधर पर फूलों-सी मुस्कान
व्यवहार कुशल हो जन मानस
हरित-भरित हो वन-उपवन
प्रकृति संरक्षण का मूल मंत्र
जल हरियाली से ही जीवन
ऋतु बसंत का जीवन दर्शन।।

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