घर-आँगन की रौनक है
करता हरदम सैर-सपाटा
नंद के लाल सदृश लीला
कभी ज्वार और कभी भाटा
सबका प्यारा,राज-दुलारा
आकर्ष अद्भुत और निराला ।
भय नहीं डांट-डपट का किंचित
आन-बान का नहीं पता
हरपल-हर क्षण चंचल-सा मन
मधुर हास मन आनंद दाता
हर्षित-पुलकित पुरजन-परिजन
आकर्ष की अनुपम बाल अदा ।
निर्मल-निश्छल है मुखमण्डल
काले बाल सम काली घटा
धमा-चौकड़ी इधर-उधर
अस्तव्यस्त घर रहे सदा
माँ के आँचल मे छुप जाए
हमने तो कुछ नहीं किया ।
बाल अदा से वारी-न्यारी
माँ-दादी का दुख दर्द मिटा
तनाव भंजक आकर्ष-आकर्षक
नाना बिसरे व्याधि-व्यथा
आनंदित हैं दादा शशि-सम
निरखि बाल कृष्ण लीला ।
आकांक्षा-तुषार के जिगर का टुकड़ा
आकर्ष पर बरसे आशीष सदा
आशीर्वाद का है आकांक्षी
सब दें इसे आशीष–दुआ
सबके आँगन गूँजे किलकारी
ईश्वर की सबपर सदा कृपा ।।





